शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015
" हिंदी की संस्कृति "
हिंदी भाषा पर बात करते हुए सबसे पहला प्रश्न यही उठता है कि एक भाषा और राष्ट्रीयता का सम्बन्ध अनिवार्य रुप से किन बिन्दुओं पर जुड़ जाता है ? भाषा और संस्कृति या भाषा और जातीयता का प्रश्न अनिवार्य रुप से जुड़ा हुआ है और इसे समझे बिना हमारा व्यवहार और हमारा सिद्धांत स्पष्ट नहीं हो सकता।
हर भाषा की अपनी 'प्रकृति' होती है। उसकी इस प्रकृति के बनने में उस क्षेत्र-देश की भौगोलिकता,आचार-विचार, इतिहास-धर्म....परम्पराएँ सभी का योगदान होता है। एक भाषा के बनने में केवल व्याकरण या भौगोलिक रुप के बनने का योगदान प्राथमिक रुप से होता है,अंतिम रुप से नहीं। किसी समृद्ध भाषा होने के लिए उसे एक जातीय-सांस्कृतिक रुप होना ही पड़ता है। वैसे तो प्रत्येक भाषा संस्कृति ही होती है,क्योंकि उसमें उस भाग के व्यक्तियों की चेतना क्रियाशील होती है,लेकिन भाषा के जातीय बोध का प्रयोग हम यहाँ व्यापक स्तर पर कर रहे हैं। व्यापक रुप में जातीयता,राष्ट्रीयता का बोधक हो जाती है और राष्ट्रीयता का बोधक हो जाती है और राष्ट्रीयता संस्कृति का रुप ले लेती है। प्रश्न है कि कोई भाषा राष्ट्रीय कैसे हो जाती है ?राष्ट्रीय भाषा का अर्थ यहाँ केवल बड़े भू-भाग से नहीं है,नहीं तो अंग्रेजी भाषा हमारे या अन्य कई देशों की जातीय संस्कृति बन चुकी होती; हालाँकि कुछ लोग ' अंगेजी संस्कृति' की वकालत भी करते रहे हैं,लेकिन यह "आरोपित संस्कृति" है।'औपनिवेशिक संस्कृति ' के औज़ार कभी भी हमारे लिए जातीयता के भेदक लक्षण नहीं बन पाते। "विश्व बाज़ार " के हथियार के रुप में अंग्रेजी हो सकता है,कुछ लोगों के लिए आज भी "सुरक्षित नाव " हो किन्तु "संस्कृति की विस्मृति" के लिए आज भी अंग्रेजी भाषा से घातक और कुछ भी नहीं,बावजूद अंग्रेजीदा कुछ लोग अब भी जातीयता व संस्कृति के गीत गाये जा रहे हैं। किसी भी भाषा की जातीयता कुछ बिन्दुओं पर स्थिर होते हैं। एक भाषा में उस सम्पूर्ण राष्ट्र की संस्कृति को व्यक्त/अभिव्यक्त करने की क्षमता है या नहीं ? इस सन्दर्भ में एक बड़ा प्रश्न है। "सम्पूर्ण राष्ट्र की संस्कृति का तात्पर्य" उस देश की 'मूलभूत विशेषता ' से है। मूलभूत विशेषता का तात्पर्य उस राष्ट्र के बनने के भेदक लक्षणों एवं प्रक्रियाओं से जुड़ना है। राष्ट्र के भेदक लक्षण उस देश की चेतना एवं व्यवहार है। व्यवहार एवं चेतना के धरातल पर कोई राष्ट्र एक दूसरे राष्ट्र से अलग व्यवहार करने लगता है।"यह अलग व्यवहार " करने की प्रवृत्ति एवं प्रकृति उस देश का आधारभूत व्यक्तित्व होता है। प्राय: हमारा व्यक्तित्व अलग धरातल की ओर तभी जाता है जब हम आत्मनिष्ठ तत्वों की ख़ोज की ओर प्रवृत्त होते हैं। बाह्य लक्षण तो प्राय: एक जैसे ही होते हैं। भौतिक प्रगति में भेदकता की सम्भावना कम-ही होती है। जैसे भारत की भिन्नता का धरातल केवल यह नहीं है कि यहाँ कई समृद्ध भाषाएँ एवं बोलियाँ हैं बल्कि यह भी है कि यहाँ अपनी "आंतरिक संस्कृति" को खोजने की अकुलाहट दूसरे देशों से ज्यादा ही रही है। आंतरिक रचाव में हर व्यक्ति दूसरे से भिन्न है...इस भिन्नता को पकड़ लेने वाली संस्कृति व भाषा दोनों ही समृद्ध हो जाती हैं। अनायास नहीं कि भारत की आध्यात्मिक संस्कृति बहु-भाषा की संकल्पना के साथ विकसित हुई और पश्चिमी संस्कृति,भौतिकता प्रधान संस्कृति एक भाषा की उदघोषणा व नारे के साथ....।प्रश्न यह है कि भाषा और राष्ट्रीयता का सम्बन्ध अनिवार्य रुप से कैसे घटित होता है ? राष्ट्रीय आन्दोलन के समय में "हिंदी" ही राष्ट्रीय व्यंजना की बोधक कैसे बनी ? इस प्रश्न को समझना अनिवार्य है।प्रश्न है क्या व्याकरणिक सम्पन्नता के कारण ? इस ढंग से देखें तो संस्कृत,बांग्ला,तमिल,तेलुगु........जैसी भाषाएँ भी समृद्ध रही हैं, फ़िर ? नहीं इसका उत्तर तो जातीयता और राष्ट्रीयता के भेदक लक्षणों को ध्यान में रखकर ही दिया जा सकता है। कुछ लोग इस सन्दर्भ में राजनीतिक कारणों (दिल्ली की केन्द्रीयता) को केंद्र में रखते हैं ।यह व्याख्या गलत तो नहीं लेकिन अंतिम भी नहीं। प्रश्न है जिस दिल्ली के आस-पास के केंद्र से खड़ी बोली विकसित हो रही थी....जिस क्षेत्र में रासो ग्रन्थ और राष्ट्रीयता(?) के लक्षण तैयार किये जा रहे थे ,उस प्रदेश में कोई भाषाई आन्दोलन ( 19 वीं शताब्दी से पूर्व तक ) खड़ा हो पाया ? या क्यों नहीं खड़ा हो पाया ?( क्या पाली -प्राकृत या अपभ्रंश को हम भाषाई आन्दोलन मानें ?) किसी केंद्र से ....उस भाषा के प्रति आग्रह का न होना कई बार खटकता है। दिल्ली के आस-पास की भाषा तभी तक राष्ट्रीय भाषा बन सकती थी,जब तक कि वह सम्पूर्ण राष्ट्र पर शासन करने वाली भाषा होती....लेकिन हिंदी के साथ ऐसा तो नहीं हुआ। हिंदी उस ढंग से राजदरबार या सत्ता की भाषा भी कभी नहीं बनी,जिस प्रकार संस्कृत-क्लासिक परम्परा में, पालि-बौद्ध शासन काल में ,प्राकृत- जैन शासन काल में ,फ़ारसी-मुस्लिम शासन काल में या अंग्रेजी - अंग्रेजों के शासन काल में.....।यदि राजनीतिक कारणों से हिंदी को राष्ट्रीय भाषा होने का गौरव प्राप्त होता तो उसे राजदरबार या सत्ता की भाषा भी होना चाहिए था। राजनीतिक भाषा का चरित्र आधिपत्य का होता है। वह दूसरी भाषाओँ को दबाकर...उनपर आधिपत्य स्थापित कर विकसित होती है। हिंदी ने किसी भी प्रादेशिक भाषा या बोली को दबाने की कोशिश नहीं की....।राजभाषा बनने के बाद भी (सरकारी संरक्षण मिलने के पश्चात भी ...) हिंदी ने अपने आधिपत्य को स्थापित करने का प्रयत्न उस रुप में नहीं किया,जैसा कि अंग्रेजी ने दूसरी बोलियों के साथ किया था। फ़िर भी दिल्ली के आस-पास की भाषा के फलने-फूलने का विस्तृत अवसर मिला तो उसमें उसकी राजनीतिक स्थिति की भूमिका को अस्वीकार कैसे किया जा सकता है। इस सन्दर्भ मइ भाषा और व्यापार की बात भी अक्सर की जाती है। अंग्रेजी भाषा के विकास को जिस प्रकार रिनैशा से जोड़कर देखा जाता है,उसी प्रकार हिंदी भाषा के विकास में व्यापारिक जातियों की भूमिका की बात बीही स्वीकार की जाती है। इस सन्दर्भ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल व रामविलास शर्मा जी ने हमारा ध्यान आकर्षित किया है। आचार्य शुक्ल की उपस्थापना है कि मुग़ल साम्राज्य के ध्वंश के पश्चात व्यापारिक जातियाँ पश्चिम से पूर्व की ओर चलीं। इसी क्रम में वे अपनी भाषायें भी लेती चली गयीं। पूर्व (बंगाल) से हिंदी पत्रकारिता,हिंदी नवजागरण का गहरा सम्बन्ध रहा है। हालाँकि इस सन्दर्भ में " हिंदी प्रदेश " की भूमिका या उसके महत्व को कम करके नहीं आँका जा सकता। व्यापार से एक भाषा दूसरे क्षेत्र तक जाये ,इस बात में क्या संदेह ? उर्दू भाषा का जन्म शिविर व युद्ध ( यानी एक -क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक की यात्रा व संक्रमण ) से कैसे हुआ ,यह हम जानते ही हैं। उसी प्रकार हिंदी ( खड़ी बोली ) एवं तेलुगु भाषा के मिश्रित रुप से "दकनी भाषा " कैसे बनी ,इस तथ्य को भी हम जानते हैं। यहाँ ठहरकर यह यह प्रश्न किया जा सकता है कि संस्कृत मूल रुप से धर्म-संस्कृति-साहित्य-कर्मकाण्ड की भाषा बनी रही,वह व्यापार की भाषा नहीं बनी;क्या इसलिए ही संस्कृत धीरे-धीरे सिमट कर 'आभिजात्य' की भाषा बनती गयी (हालाँकि रामविलास शर्मा जी ने संस्कृत को लोकभाषा ही माना है.....) ?संस्कृत भाषा के सामानांतर प्राकृत-पालि भाषाएँ कर्मकांड से हटकर व्यापार की भाषा भी बनीं। आज अंग्रेजी भाषा व्यापार की भाषा बन गई है ,लेकिन हिंदी ? हिंदी संवेदना की भाषा तो बनी, किन्तु व्यापार की भाषा नहीं बन पाई है। क्या कारण है कि संस्कृत एवं हिंदी दोनों व्यापार की भाषाएँ नहीं बन पायीं हैं ?इसके उत्तर की ख़ोज में हम प्रवृत्त में हों उससे पूर्व हम भाषा और धर्म के अंतर्संबंध को समझ लें। संस्कृत इस ढंग से सम्पूर्ण भारत में प्रचलित रही है। धर्म-कर्म की भाषा उत्तर से दक्षिण तक संस्कृत ही रही है। धर्म की भाषा बनने से वह भाषा सांस्कृतिक रुप तो ले लेती है लेकिन उस भाषा में अपेक्षाकृत गतिशीलता का अभाव भी हो जाता है।" संसकिरित है कूप जल/भाखा बहता नीर " जैसी उक्तियाँ इस बात की ही द्योतक हैं। अनायास नहीं है कि संस्कृत की इस सीमा को हिंदी ने समझा और वह कर्मकाण्ड से नहीं जुड़ी। कर्मकाण्ड चाहे भाषा का हो या समाज का, उसमें जड़ता का होना अनिवार्य ही है। धर्म-कर्म की भाषा होने की सर्वाधिक काम्य स्थिति,किसी भाषा के ललिए यह होती है कि वह धर्म-संस्कृति को एक पहचान का माध्यम बनने में मदद करती है।52 शक्तिपीठ ,4 आश्रम या 12 ज्योर्तिलिंग इत्यादि जैसे धार्मिक पीठ की एकसूत्रता या एकरूपता में संस्कृत भाषा के महत्व से इनकार नहिन् किया जा सकता। लेकिन यहीं प्रश्न किया जा सकता है कि "धार्मिक पहचान " बनने के बावजूद संस्कृत राष्ट्रीय भाव बोध कइ भाषा क्यों नहीं बनी ? यह सम्मान हिंदी को ही क्यों मिला ? इसका उत्तर हमें भारतीय संस्कृति के विभिन्न पड़ाओं को देखकर ही प्राप्त हो सकता है। किसी भाषा के बनने -गठन होने के "जातीय कारण" होते हैं। संस्कृत भाषा के बनने....निर्मित होने के कारणों की समझ यहाँ हमें इस प्रश्न का उत्तर तलाशने में ममदद करती है। संस्कृत भाषा का सम्बन्ध प्राकृतिक सत्ता की स्तुति...तीव्र भावावेग के साथ छंद के अनुशासन से जुड़ा हुआ है। अपनी सहजता में भाषा तीव्र भावावेग से ही फूटती है। भाव के अभाव में वाणी मौन हो जाती है। अपने से प्राकृतिक सत्ता की निकटता.....ईश्वर और ममनुष्य की ननिकटता के क्रम में वेद की ऋचाएँ निर्मित हुई हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि संस्कृत भाषा के छंद के अनुशासन से बंधने का मूल ककारण भावातिरेक एवं विषय का "अलग प्रवाह " ही था,जिसने उस भाषा की संरचना को स्थिर किया किसी भाषा के बनने की कोई एक तिथि नहीं होती और न एक घटना। हाँ एक लम्बी प्रक्रिया के पश्चात वह अपना स्वरुप ग्रहण करती है। ऊपर हमने भाषा की केन्द्रीयता के कारक तत्वों की संक्षेप में चर्चा की। हमें समझना होगा कि वह भाषा ही केन्द्रीय भूमिका में स्थिर होती है जो अपने युग -समाज की सम्भावना का नेतृत्व करती है। संस्कृत नइ अपने समय में,पालि-प्राकृत ने यही कार्य अपने समय में किया। संक्रान्तिकाल में यही कार्य अपभ्रंश-अवहट्ट ने किया।10-11 वीं शताब्दी के बाद यही कार्य हिंदी एवं जनपदीय भाषाओँ ने किया। समाज-संस्कृति की परम्परा की तरह ही भाषा की भी परम्परा होती है। जहाँ नवीन भाषा अपने पूर्व की भाषा के दाय को स्वीकार कर उसे आगे ले जाती है। यहाँ न तो पूर्व भाषा का नकार ही होता है और न स्वीकार ही,बस "युग-धर्म" के अनुरूप 'रुपांतरण' होता है। और जो भाषा समाज-संस्कृति के इस दाय को जितने लम्बे समय तक निभा ले जाती है,वह "क्लासिक भाषा " होती है।क्लासिक भाषा की उम्र कम-से-कम 1000 साल होनी ही चाहिए। इस दृष्टि से संस्कृत, तमिल,तेलुगु ,मलयालम......हिंदी जैसी बीहभाषाएँ भारत की क्लासिक भाषाएँ हैं। पालि-प्राकृत जैसी भाषाएँ तत्कालीन युग की केन्द्रीय भूमिका निभाने के बावजूद किसी धर्म-जाति से सम्बद्ध ज्यादा रहीं,इसलिए बड़ा साहित्य होने के बावजूद.....राजनीतिक संरक्षण मिलने के पश्चात भी वे नष्ट (सिमट) हो गईं। या व्यवहार से ग़ायब हो गयीं। इस बिंदु पर आकर हम हिंदी भाषा के बनने एवं "हिंदी संस्कृति" पर बातचीत कर सकते हैं। जिसे हम " हिंदी जाति " या "हिंदी प्रदेश" कहते हैं,वह मूल रुप से दिल्ली,हरियाणा,हिमाचल प्रदेश,राजस्थान,बिहार,उत्तर प्रदेश,उत्तराखंड,मध्य प्रदेश,झारखण्ड,छत्तीसगढ़.......जैसे राज्य आते हैं। इसके साथ ही महाराष्ट्र,आंध्र प्रदेश,गुजरात,पंजाब के कुछ हिस्से पर उसका प्रभाव पड़ा है। मागधी अपभ्रंश के प्रभाववश मिथिला से सटे बंगाल तक इसकी व्याप्ति चली जाती है।इसी प्रकार संस्कृत की काव्यशास्त्रीय परम्परा को स्वीकार कर लेने पर कश्मीर को भी हम हिंदी संस्कृति में शामिल कर लेते हैं।यहाँ यह कह देना आवश्यक है कि शौरसेनी अपभ्रंश,मागधी,अर्द्ध मागधी....जैसी प्राकृतों की भूमिका इस सन्दर्भ में कार्य कर रही थीं जो पूर्व की संस्कृत-प्राकृत की जातीय चेतना का ही विकास थी। जब हम 'हिंदी संस्कृति' का प्रयोग कर रहे होते हैं तो हमें स्पष्ट रुप से समझ लेना चाहिए कि हम खड़ी बोली हिंदी की बात नहीं कर रहे होते हैं ,क्योंकि उसमें ब्रज,अवधी,बिहारी,राजस्थानी,पहाड़ी.....के साथ 18 जनपदीय भाषाएँ एवं उर्दू सभी शामिल होती हैं। संस्कृति कहने का औचित्य यह भी है कि प्रारंभ में यह 'देश ' का बीबोधक थी,फ़िर यहाँ के निवासियों के लिए व्यवहृत होने लगी,तत्पश्चात भाषा के अर्थ में। छ्ठी शती में पंचतंत्र का अनुवाद करने वाले नौशेरवां बादशाह के दरबारी कवि ने पञ्चतंत्र की भाषा को " ज़बाने हिंदी " कहा है। दसवीं शती के अबुल माली नसरुल्ला-बिन-अब्दुल्ल हमीद ने भी पंचतंत्र की भाषा को " ज़बाने हिंदी" ही कहा है। अल्बरुनी ने हिन्द (भारत) की सभी भाषाओँ के लिए "अल हिंदय: " शब्द का प्रयोग किया है। इसी प्रकार 13 वीं शती के फ़ारसी कवि औफ़ी ने "हिंदवी" शब्द का प्रयोग किया है। इसी प्रकार 13-14 वीं शती में अमीर खुशरो ने "हिंदी" ," हिंदवी" या " हिन्दुई " जैसे शब्दों कअ प्रयोग सम्पूर्ण भारत की भाषाओँ के लिए किया है। अमीर खुशरो ने भारत की बीभाषाओँ का 11 भेद किया ।उनके भाषा भेद मइ लाहौरी,काश्मीरी,बंगाली,गौड़ी,गुजराती,तिलंगी,मावरी/कोंकणी,ध्रुव सुंदरी,अवधी,देहलवी और इतराफ की ज़वान नाम हैं। इन भेदों में अलग से "हिंदवी" नाम का ककोई विभाजन नहीं है। खुशरो के समय तक हिन्दवी भारत की भाषाओँ के एक सामूहिक नाम के रुप में प्रचलित थी। इस प्रकार का उदाहरण अकबर के समय में भी मिलता है। अकबर के दरबारी कवि अबुल फ़ज़ल ने भारतीय भाषाओँ कको देहलवी,बंगाली,मुलतानी,मारवाड़ी,गुजराती,तिलंगी,मराठी,कर्नाटकी,सिंधी,अफगानी,विलोचिस्तानी और कश्मीरी नाम से उल्लखित किया है। इस सन्दर्भ में ब्रजेश्वर वर्मा का कथन ध्यातव्य है : " 'हिंदी' या 'हिंदवी' का उल्लेख कदाचित इसलिए नहीं किया गया हहै कि यह नाम किसी भाषा-विशेष के ललिए ननहीं,बल्कि सामूहिक रुप से सभी भारतीय भाषाओँ के लिए प्रयुक्त होता था ।" जिस प्रकार हिंदी या ह हिंदवी सम्पूर्ण भारतीयता का बीबोधक थी, उसी प्रकार खड़ी बोली के लोकप्रचलित रुप को "भाखा" कहा जाने लगा था। इस सन्दर्भ में एक महत्वपूर्ण तथ्य ध्यान देने योग्य है,और जिसका प्रारंभ में ही मैंने संकेत किया था, कि हिंदी भाषा इस संस्कृति के केंद्र में थी और उसकी लम्बी सांस्कृतिक परम्परा रही है। जिसे रामविलास शर्मा जी "हिंदी जाति" या " हिंदी संस्कृति " कहते हैं,वह वस्तुत: उसी केंद्र-संस्कृति की प्रतीक थी, जिसे " मध्यदेश " कहा जाता था। मध्यदेश की भाषा के केंद्र में ही संस्कृत-प्राकृत-अपभ्रंश जैसी भाषाएँ थीं। मध्यदेश का विस्तार केवल भारत के मध्यप्रदेश तक ही सीमित नहीं था....बल्कि इस केंद्र में हिमालय से लेकर विन्ध्य पर्वत तक तथा बीकानेर से प्रयाग तक की सीमाएँ शामिल थीं। इस प्रकार मध्यदेश शब्द का व्यवहार अभिधा,लक्षणा दोनों के अर्थ में होता रहा है। जिस प्रकार ब्रजभाषा ब्रज भूमि की भाषा होकर भी व्यापक स्वरुप ग्रहण कर लेती है( ब्रजभाषा हेतु ब्रजभाषा ही न अनुमानो-भिखारीदास) ,उसी प्रकार हिंदी भाषा एक क्षेत्र की भाषा नहीं थी। हिंदी भाषा बनने के आरंभिक दौर में भी सिद्धों ( पूर्वी बीभारत- बंगाल,बिहार,उड़ीसा ),नाथों (पंजाब,राजस्थान,उत्तर प्रदेश,मध्य प्रदेश तक....), जैनों ( राजस्थान,गुजरात, महाराष्ट्र....), रासो साहित्य ( पंजाब,राजस्थान,दिल्ली,हरियाणा...) एवं लौकिक साहित्य ( पूर्व भारत से लेकर पश्चिम भारत तक ) तथा दकनी साहित्य ( दक्षिण के हैदराबाद तक )में हिंदी भाषा अपना सांस्कृतिक प्रसार कर लेती है।इसी प्रकार यदि भक्तिकाल का सन्दर्भ लें तो वहाँ भी संत साहित्य ( सम्पूर्ण उत्तर भारत एवं पश्चिमी भारत) ,सूफ़ी काव्य ( पश्चिमोतर एवं दक्षिणी भारत ),कृष्णभक्ति काव्य( मध्यदेश का केंद्र ब्रज,मथुरा,आगरा,दिल्ली एवं पूर्वी भारत-बंगाल,बिहार-उड़ीसा तक ) एवं रामभक्ति शाखा ( मुख्यत: अवध मंडल,किन्तु व्याप्ति सम्पूर्ण भारत ) सम्पूर्ण भारत तक व्याप्त हो जाते हैं। इसी प्रकार जब रामस्वरुप चतुर्वेदी अपने इतिहास में इस प्रश्न से टकरा रहे होते हैं कि आधुनिक काल के प्राय: बड़े हिंदी कवि गैर-खड़ी बोली क्षेत्र से क्यों आते हैं ? चतुर्वेदी जी दरअसल हिंदी या खड़ी बोली कइ बीच जिस विभाजन का प्रश्न उठा रहे हैं, वह मात्र इसलिए, क्योंकि वह हिंदी की जातीय चेतना को न देखकर उसे स्थान-विशेष की भूमि के रुप में ही देख रहे होते हैं। जब रामविलास शर्मा जी " चित्रकला ,स्थापत्य कला,संगीत,साहित्य , इन सबका विकास हिंदी क्षेत्र में हुआ ," कहते हैं तो प्रकारांतर से उस मूल चेतना की ओओर ही संकेत कर रहे होते हहैं,जिसका संकेत हमने किया था। राम,कृष्ण,बुद्ध,महावीर,शिव......जैसे जननायकों की कर्मभूमि का प्रश्न हो या विदेशी आक्रमणों का केंद्र ( सिकंदर,शक-हड़,तुर्क या अंग्रेजी उपनिवेश का केंद्र-कलकत्ता,अवध,बनारस,दिल्ली....ये सभी भारत के मध्यक्षेत्र ही बने। हाँ इस ररुप ।इ दक्षिण नइ अपनी भूमिका भक्तिआन्दोलन कके समय में अवश्य पूरी की। शंकराचार्य,निम्बार्क,बल्लभाचार्य,रामानंद जैसे बड़े आध्यात्मिक गुरु पैदा तो दक्षिणमें हहुए किन्तु उन्होंने अपनी ककर्म बीभूमि उत्तर को बनाई। भारत की सांस्कृतिक क चेतना की प्रतिमूर्ति श्री अरविन्द में हुई जो बंगाल में पैदा होकर दक्षिण को अपनी कर्म-भूमि बीबनाते हहैं। इस प्रकार उत्तर-दक्षिण के दो ध्रुव चाहे वह संस्कृति के विपरीत ध्रुव (आर्य-अनार्य) पर टिकें हों या भाषा-परिवार ( भारोपीय भाषापरिवार और द्रविण भाषा परिवार )की भिन्नता पर, हमारे नायकों ने इसे पलटने का ही प्रयत्न किया है। अनायास तो नहीं कि हमारे दो जातीय महाकाव्य रामायण एवं ममहाभारत अपनी कथा में भारत के बड़े भू-भाग को समेट लेते हैं।
हिंदी भाषा की जातीयता के प्रश्न को भारतीय नवजागरण के सन्दर्भ में समझें तो बात थोड़ी और स्पष्ट होगी। भारतीय समाज की प्रगतिशीलता के महत्वपूर्ण बिंदु वेद का निर्माण,महाकाव्यों का गठन,बुद्ध एवं महावीर का आगमन,भक्तिआन्दोलन एवं प्रादेशिक भाषाओँ का उदय,आधुनिक नवजागरण एवं राष्ट्रीय आन्दोलन....रहे हैं। इन बड़ी घटनाओं के बीच भाषा की भूमिका कैसे बनती- बिगड़ती रही है,इस तथ्य को समझना आवश्यक है। वेदों का निर्माण छांदस संस्कृत में हुआ ,महाकाव्यों का लौकिक संस्कृत में,बौद्ध साहित्य का केंद्र पालि बनी तो जैन साहित्य का प्राकृत। इस सन्दर्भ में 1000 ईस्वी के आस-पास का समय भी महत्वपूर्ण है। यह समय जनपदीय भाषाओँ के उदय का है। इसी समय हिंदी,बंगला,गुजराती,मराठी......जैसी भाषाएँ अपना स्वरूप ग्रहण कर रही हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि भक्तिआन्दोलन की चेतना के मूल में रीतिवादी वृत्तियों का नकार है और इसीलिए जनपदीय भाषाओँ का उभार भी इस सम्बन्ध में विशेष अर्थ रखता है। ब्रजभाषा,अवधी,मैथिली,हिंदी.....जैसी भाषाएँ अपने रुप को ग्रहण कर रही थीं। आधुनिक काल में आकर खड़ी बोली को केन्द्रीयता....।राष्ट्रीय आन्दोलन ....भारतीय नवजागरण की अपनी भाषा। इस प्रकार भारतीय संस्कृति के जातीय चेतना के उभार में भाषा एक आवश्यक केंद्र बिंदु के रुप में उभरी है। जब हम यह प्रश्न पूछते हैं कि राष्ट्रीय आन्दोलन में हिंदी ही "सांस्कृतिक भाषा " क्यों बनी ? जातीय भाषा क्यों बनी ? तब इस प्रकार के प्रश्नों का उत्तर हम भारत की सांस्कृतिक परम्परा के अध्ययन से स्वत: ही प्राप्त कर लेते हैं।
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सारगर्भित एवं प्रेरक लेख है
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