शुक्रवार, 20 मई 2022

रचना प्रक्रिया और रचना शैली

 रचना प्रक्रिया और रचना शैली : कुछ स्फुट बातें


आज एक प्रिय मित्र से रचना प्रक्रिया और रचना शैली पर बातचीत हुई। मित्र ने रचना प्रक्रिया को वस्तुनिष्ठ और रचना शैली को आत्मनिष्ठ कहा। रचना प्रक्रिया को प्रायः लोग आत्मनिष्ठ समझते हैं। वे कहते हैं कि प्रत्येक लेखक की रचना प्रक्रिया अलग होती है या अलग हो सकती है। क्या वाकई ऐसा है? मुक्तिबोध ने कविता की रचना प्रक्रिया को तीन क्षणों में विभक्त किया। स्वयं मुझे यह प्रक्रिया चार चरणों में दिखी। किन्तु क्या हर रचनाकार के लिए अलग रचना प्रक्रिया है? किसी कथ्य के रचना में ढलने की प्रक्रिया क्या लेखक के अधीन है? प्रथमतः हमें लगता है कि रचना प्रक्रिया लेखकीय व्यक्तित्व के अधीन है, किन्तु ऐसा होता नहीं। रचना का निर्माण कथ्यगत होता है, व्यक्तित्वगत नहीं। एक कथ्य ही अनेकों प्रक्रियाओं से होते हुए रचना/कला में ढल जाता है। अतः उसमें वस्तुनिष्ठता होती है। प्रश्न है कि फिर रचनाकार के व्यक्तित्व की इसमें क्या भूमिका होती है? एक रचनाकार का व्यक्तित्व रचना के भीतर उसकी वैचारिकी में इस प्रकार अंतर्भुक्त होता है कि वह रचना को विशिष्ट तो बनाता है, किन्तु उसकी प्रक्रिया तो वस्तुनिष्ठ ढंग से ही चला करती है। रचना प्रक्रिया का संबंध कथ्य की माप व उसके विभिन्न पड़ाव हैं। मसलन ग्रामीण पृष्ठभूमि पर या मानवीय संबंधों पर प्रेमचंद और प्रसाद दोनों एक कहानी लिखते हैं। प्रश्न है कि कहानी में पार्थक्य के बिंदु कहाँ होते हैं? दोनों कहानियों पर दोनों रचनाकारों के व्यक्तित्व का प्रभाव तो दिखेगा, उनकी शैली अलग होगी, किन्तु क्या रचना प्रक्रिया के स्तर पर कहानी रचना के पड़ाव भी भिन्न बनेंगे? कुछ रचनाकार इस प्रक्रिया को आत्मनिष्ठ रूप में देखने का प्रस्ताव रचते हैं, रचना प्रक्रिया को अमूर्त समझते हैं; किन्तु यह दृष्टि रचनाकार व्यक्तित्व को कथ्य और रचना प्रक्रिया से ज्यादा महत्व देने के क्रम में गतिशील होती है। हां यह हो सकता है कि किसी रचना के बनने की प्रक्रिया में असंबद्धता हो, क्रम उलट-पुलट से लगें; किन्तु क्या रचना के रचाव क्षण में भी यह बेतरतीबी बरक़रार रहती है? दरअसल जब हम ऐसे असंबद्ध दृश्यों की बात करते हैं, तब हम असंबद्ध अनुभवों की बात कर रहे होते हैं। लेकिन जब हम रचना क्षणों में होते हैं, तब हमारे अनुभव एक बिंदु पर अपने को सघन करते हैं। रचना प्रक्रिया में हमारे अनुभव और कथ्य एक द्वंद्वात्मक योग रचते हैं। हमारा अनुभव रचना प्रक्रिया को वैयक्तिक रूप देता है, किन्तु कथ्य उसे वस्तुनिष्ठ रूप देता है। कथ्य वैयक्तिक होते हुए भी अपनी प्रक्रिया में वस्तुनिष्ठ होकर ही सार्थक हो पाता है। वस्तुनिष्ठता वस्तुतः या मुख्यतः क्रिया के स्तर पर घटित होती है। किन्तु प्रभाव में केवल आत्मनिष्ठता हो, यह आवश्यक नहीं। नहीं तो हर रचना का आस्वादन पाठक अपने ढंग से ग्रहण करता। हां यह होता है कि एक पाठक किसी रचना में अपनी दृष्टि आरोपित कर देता है, किन्तु उसके आस्वादन की प्रक्रिया पूर्णतः स्वायत नहीं। रस वस्तुनिष्ठ है। आस्वाद के स्तर पर व्यक्ति/भोक्ता के भीतर वह प्रकट होता है। वस्तुनिष्ठ चीजें ही एक समान ढंग से अपने को प्रकट करती हैं। ऊपर हमने लेखकीय शैली को आत्मनिष्ठ कहा। एक लेखक के अनुभवबोध और व्यक्तित्व के प्रक्षेप को हम शैली में ढलते देखते हैं। रचनाकार के व्यक्तित्व को जब रचना प्रक्रिया की वस्तुनिष्ठता अपनी यांत्रिकता में नहीं ढाल पाती, तब रचना शैली का प्रश्न उठ खड़ा होता है। रचना शैली लेखक का व्यक्तित्व अर्जन है। रचना प्रक्रिया कथ्य की क्रियात्मक अभिव्यक्ति है। इस ढंग से कथ्य और व्यक्तित्व की भंगिमाएं ही रचना में वस्तुनिष्ठ और आत्मनिष्ठ रूप धारण कर लेती हैं।

गुरुवार, 19 मई 2022

रचना और व्यक्तित्व का प्रश्न


   

   

(1)

 

प्रश्न है कि क्या ऐसा कोई सिद्धांत और विज्ञान है जो यह बता सके कि किसी ख़ास व्यक्तित्व का व्यक्ति किसी ख़ास ढंग की ही कविता रचेगा? प्रश्न यह भी है कि किसी 'रचनात्मक-व्यक्तित्व' को क्या किसी ख़ास ढाँचे में बांधा जा सकता है? यदि व्यक्तित्व वाकई रचनात्मक है तो क्या वह किसी विषय से बंधा हुआ हो सकता है? एक सृजनशील व्यक्ति के लिए हर विषय एक चुनौती की तरह आते हैं...वह सब पर अपनी लेखनी चलाता है...फिर भी उसका व्यक्तित्व किन्हीं 'विशेष विषयों' की ओर झुका रहता है...जैसे व्यवस्था पर, प्रेम पर, परिवार पर, प्रकृति पर... या अन्यान्य विषयों की केंद्रीयता पर। तो क्या कवि के व्यक्तित्व और उसकी रचना में स्पष्ट तौर पर कोई आनुपातिक संबंध बैठाया जा सकता है? जैसे साहित्य में कुछ स्थायी भाव होते हैं, वैसे ही क्या कवि व्यक्तित्व का भी कुछ स्थायी भाव होता है? यानी कोई कवि किन्हीं ख़ास मनोवृत्तियों की केंद्रीयता में अपने रचनाकार व्यक्तित्व का निर्माण करता है।

 

(2)

रचना और 'कवि-व्यक्तित्व' के प्रश्न को बहुधा उठाया जाता रहा है। क्या कोई रचना किसी रचनाकार की प्रतिनिधि होती है? पारंपरिक...आदर्शवादी दृष्टिकोण रचना और रचनाकार के बीच आनुपातिक संबंध पर बल देती है। किंतु मनोविश्लेषणवादी तथा आधुनिक दृष्टिकोण रचना और उसके रचनाकार के बीच इस प्रकार की अनिवार्य एकता से इंकार करते हैं। राजेश जोशी इन अतिवादों के बीच 'कवि-व्यक्तित्व' का सुझाव देते हैं। "रचना में रचनाकार का जो व्यक्तित्व है, वह अपने व्यक्तित्व से अर्जित व्यक्तित्व है। कवि समय की तरह कवि-व्यक्तित्व। यह उसके अपने व्यक्तित्व से निरपेक्ष या पूरी तरह स्वतंत्र नहीं। वह स्वायत्त है। यह बहुत जटिल संरचना है" (एक कवि की नोटबुक) हालांकि राजेश इस 'कवि-व्यक्तित्व' की बहुत विस्तार से व्याख्या नहीं करते। हाँ संकेत जरूर करते हैं। वे लिखते हैं- "कहीं ऐसा तो नहीं है कि रचनाकार अपने व्यक्तित्व की कमियों की क्षतिपूर्ति, अपनी रचना में करता है? ऐसा सब कुछ, एक हद तक हो सकता है! शायद! (वही) कुछ इसी प्रकार का तर्क मनोविश्लेषणवादी आचार्य भी देते हैं। वे इस तर्क को मानते हैं कि- "रचना किन्हीं विशेष क्षणों की निर्मिति होती है।" इस तर्क की अवान्तर व्याख्या यह भी है कि रचना करते समय रचनाकार अपने अंतर्विरोधों से मुक्त हो जाता है।" यानी शुद्ध मन-मस्तिष्क को धारण कर लेता है। आज जब रचनाकार व्यक्तित्व और उनकी रचनाओं में द्वैतको हम देखते हैं तो यह तर्क सही होने का आभास कराता है। किंतु क्या यह वाकई संभव है? क्या रचना 'किन्हीं विशेष क्षणों' की उत्पत्ति है? हाँ यह सही है कि रचना किन्हीं विशेष तन्मयता के क्षणों में निर्मित होती है, लेकिन यह 'विशेष क्षण' क्या बिना लंबी तैयारी के संभव है? कविता/रचना तो एक 'हृदय-मार्ग' है, और जो इस मार्ग के पथिक हैं, उन्हीं के पास रचना आती है, लेकिन आज यह प्रश्न इतना सीधा नहीं रह गया है। आज रचना के बनने में हृदयका स्थान बुद्धिऔर तथा संवेदनाका स्थान विचारधाराने ले लिया है। फलत: बुद्धि और विचारधारा के संयोजन से भी रचनाएं निर्मित की जाने लगी हैं। स्मरण रहे कि हृदय-संवेदना आंतरिक प्रक्रिया है, व्यक्तित्व का अनिवार्य पक्ष है... किंतु बुद्धि-विचारधारा व्यक्तित्व का बाह्य पक्ष है...थोड़ा दूर का...बाहर से लाया गया...अर्जित... अतः कविता की निर्मिति वैचारिक ढंगसे भी की जा सकती है...जैसा कि आज के प्रायः साहित्यकार कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में कविता और कवि व्यक्तित्व का प्रश्नही निरर्थक हो जाता है।

राजेश जोशी जी यह तर्क महत्वपूर्ण लगता है कि- "कहीं ऐसा तो नहीं है कि रचनाकार अपने व्यक्तित्व की कमियों की क्षतिपूर्ति अपनी रचना में करता है? ऐसा सब कुछ, एक हद तक हो सकता है। शायद!" हालांकि राजेश जोशी अपनी बात के प्रति बहुत आश्वस्त नहीं हैं। 'एक हद तक' पद का प्रयोग किया जाए तो यह एक संभावना के स्तर पर...एक अपुष्ट परिकल्पनाके स्तर पर ही...हाँ इस तर्क को थोड़ी दूर तक...थोड़ी देर तक के लिए स्वीकार्य किया जा सकता है, लेकिन प्रश्न यह है कि कितनी दूर तक...कितनी देर तक? हाँ यह सही है कि रचना-प्रक्रिया के बीच लेखक अपने दैनिक जीवन के क्रिया-कलापों, कटुताओं से कुछ क्षण के लिए ऊपर उठ जाता है...यानी थोड़े शुद्ध रूप में वह हमारे सामने आता है, किंतु वह उस व्यक्तित्व को कैसे रच पायेगा, जो वह है नहीं? या रचेगा तो उसकी प्रामाणिकता किस हद तक होगी। उदहारण के लिए यदि जयशंकर प्रसाद 'नन्हकू सिंह' या गुलेरी 'लहना सिंह' का चरित्र खड़ा करते हैं तो क्या इसे हम उनके व्यक्तित्व की क्षतिपूर्ति के रूप में देखें? एक लेखक व्यक्तिगत क्षतिपूर्ति से ज्यादा 'सामाजिक क्षतिपूर्ति की आकांक्षा' लेकर चलता है, लेकिन स्मरण रखने योग्य बात यह है कि सामाजिक क्षतिपूर्ति के लिए व्यक्तित्व में अंतर्विरोध भले हों, किंतु उसे द्वंद्वहीन तो बिल्कुल नहीं होना चाहिए। समस्या तब होती है जब हम रचनाकार व्यक्तित्व के अंतर्विरोध और रचना में साम्य या वैषम्य ढूँढने लगते हैं, जबकि होना यह चाहिए कि हम रचना और रचनाकार व्यक्तित्व के द्वंद्वशील व्यक्तित्व के बीच साम्य या वैषम्य ढूंढते! इसलिए हम एक अपराधी, लुटेरे, डाकू, बलात्कारी या धूर्त व्यक्तित्व में रचना-क्षमता की उपलब्धता के बावजूद किसी रचना की उम्मीद नहीं करते। रही बात अंतर्विरोध की तो, वह मानव-मात्र के भीतर है; किंतु सचेत व्यक्तित्व इस अंतर्विरोध को द्वंद्व की प्रक्रिया से गुजारते हैं...और इसी कारण उनकी रचनाएं अपने दैनिक जीवन से बढ़ी हुई प्रतीत होती हैं।

 

राजेश जोशी जिस कवि-व्यक्तित्व की बात कर रहे हैं, क्या वह स्वयं उसके व्यक्तित्व से भिन्न है? कहीं यह कवि-व्यक्तित्व कवि की रचना-शैली तो नहीं है? आखिर कवि के अपने व्यक्तित्व और कवि अर्जित यानी कवि व्यक्तित्व को भिन्न कैसे माना जाए? और यदि  बहुत अधिक भिन्न माना जाए तो क्या उसके व्यक्तित्व का रचनात्मक रूप उसके व्यक्तित्व को माना जा सकता है या उसके व्यक्तित्व का प्राकट्य? किंतु यहां भी सावधानी रखने की बात यह है कि रचनाकार के व्यक्तित्व और उसके रचना व्यक्तित्व को हू--हू एक नहीं माना जा सकता। कारण यह है कि रचनाकार का अपना निजी व्यक्तित्व हो सकता है...वह स्वतंत्र हो सकता है... हास्य कर सकता है...क्रोध कर सकता है...प्रेम कर सकता है, किंतु रचना-व्यक्तित्व भी क्या उसी प्रकार से व्यक्तिगतमाना जा सकता है? एक लेखक जब अपनी रचना-प्रक्रिया के बीच होता है तब वह व्यक्तिगत राग-द्वेष का अतिक्रमण कर जाता है। जैसा कि इलियट ने 'निर्वैक्तिक हो जाना' या 'व्यक्तित्व से पलायन' कहा है, लेकिन स्मरण रहे कि यह निर्वैयक्तिक होने की प्रक्रिया भी स्वयं के व्यक्तित्व से पलायन नहीं है। अपितु स्वयं के व्यक्तित्व के राग-द्वेष से पलायन है। इस दृष्टि से कवि-व्यक्तित्व और रचना में कोई द्वैत उपस्थित नहीं हुआ। इसलिए कवि-व्यक्तित्व को 'कवि रचना-प्रक्रिया' की उच्च मनःस्थिति के रूप में समझना चाहिए। हाँ धीरे-धीरे क्रमशः अभ्यास से कवि उस मनःस्थिति को अपना 'मूल व्यक्तित्व' बना सकता है और यदि ऐसा होता भी है तो उसके पश्चात उसकी रचना फिर से वर्तमान व्यक्तित्व का अतिक्रमण कर जाएगी। यानी कवि-व्यक्तित्व जैसा कोई भाव स्थायी नहीं होता। कवि की रचना-प्रक्रिया एक उच्च मनःस्थिति में जाकर रूप ग्रहण करने लगती है...और इस मनःस्थिति से उठकर वह पुनः आगे दुनियावी व्यक्तित्व में लौट आता है। किंतु उसकी आसक्ति उसे मुग्ध किए रहती है, इसलिए जब कुछ लोग लेखकों/कवियों को पागल कहते हैं; तो उसके पीछे उस उच्च मनःस्थिति की मुग्धता ही कार्य किए रहती है।

3-

प्रश्न है कि किसी रचना के निर्माण की प्रक्रिया के बीच क्या लेखक का भी अपना व्यक्तित्व निर्मित होता है? बड़ी रचनाएं सामाजिक आकांक्षा की उत्पत्ति होती हैं। ऐसी रचनाओं के निर्माण से पूर्व रचनाकार को समाज की गति, आशा-आकांक्षा से तादात्मय स्थापित करना होता है। इस तादात्मय की प्रक्रिया में लेखकीय सघनता के साथ ही तादात्मीकरण की प्रक्रिया अनिवार्य रूप से चलती है। ऐसी स्थिति में यह स्वाभाविक है कि लेखक अपने व्यक्तित्व (मूल) से पलायन करे। किंतु हाँ पलायन रचना निर्माण तक ही होता है... हाँ यह जरूर होता है कि उसकी मनःस्थिति बार-बार एक उच्च धरातल का प्रवेश करे और वह अपने मूल व्यक्तित्व में परिवर्तन उपस्थित करे। प्रश्न है कि मूल व्यक्तित्व में परिवर्तन क्या कविता या छोटे आकार की रचनाओं के माध्यम से संभव नहीं हो सकता? छोटे आकार की रचना में लेखक बहुधा किसी विषय के प्रति तात्कालिक संवेदना व्यक्त करता है...या उससे प्रभावित होता है। इसलिए ऐसी रचनाएं लेखक को तात्कालिक रूप से द्रवित कर जाती हैं। उनमें सामाजिक आकांक्षातो होती है, किंतु भावात्मक आग्रह का उससे ज़्यादा पुट होता है। इसी कारण रचना के बनने की प्रक्रिया में लेखक के भीतर संवेदनशीलता का घनत्व तो बढ़ जाता है, किंतु चूंकि उनमें आवेग ही ज्यादा होता है, अतः वे जल्द ही स्थिर हो जाती है। हाँ, लेकिन इस प्रकार के बार-बार संवेदीकृत होने की प्रक्रिया में लेखक थोड़ा संवेदनशील होता जाता है। हाँ एक बात अवश्य स्पष्ट रूप से समझने की है कि संवेदनशीलता का प्राकट्य एक समरेखा पर ही नहीं चला करता। हर व्यक्तित्व इसे अपने ढंग से ग्रहण करता है। एक लेखक सामान्य व्यक्तित्व से ज्यादा संवेदनशील हो भी सकता है और नहीं भी। एक दूसरा तथ्य यह भी है कि लेखक की संवेदनशीलता किस ढंग से संचरणशील हो पाती है, यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है या हो सकता है कि लेखक उस संवेदना के वशीभूत हो उसे तत्काल अपनी रचना का विषय बनाए या हो सकता है कि वह तत्काल जीवन में कूद पड़े या कुछ समय पश्चात उसे अपनी लेखनी का विषय बनाए। कहने का अर्थ यह है कि कोई घटना किसी लेखक को मूर्त रूप में...अमूर्त रूप में...किस ढंग से आच्छादित कर लेती है, इसका कोई सीधा-सा सिद्धांत नहीं है। यह भी हो सकता है कि अपनी रचना में बहुत संवेदनशील दिखने वाला लेखक अपनी अन्तर्मुखता में...सामाजिक जीवन के अनुभव अल्पता में किसी घटना में प्रवृत्त हो सके। या किसी घटना पर कुछ समय पश्चात कोई सृजन करे। यानी रचना और व्यक्तित्व का प्रश्न सीधा सपाट नहीं है। यह प्रश्न बेहद जटिल है। आइए हम अपनी बात को कुछ उदाहरणों से समझने का प्रयास करें। प्रेमचंद ने ग्रामीण जीवन तथा किसान संवेदना को बहुत भीतर से (करुणा के स्तर पर मात्र वैचारिक रूप से नहीं...) महसूस किया और उसे अपनी रचना में ढाला, किंतु प्रेमचंद के सामाजिक कार्य या किसान समस्या पर उनके समाज सुधार के कार्य बहुत बढ़े चढ़े थे। तो क्या हम निष्कर्ष निकालें कि प्रेमचंद का व्यक्तित्व संवेदनशील था या उनकी करुणा मात्र साहित्यिक थी, व्यक्तित्व का अंग थी? नहीं, हम ऐसा नहीं कह सकते हैं बिना भीतर से द्रवित हुए, कारुणिक हुए प्रेमचंद जैसा नहीं लिखा सकता। बाद के वर्षों में भी किसानों पर लिखा गया, किंतु उसमें वैचारिक आग्रहज्यादा होता गया, करुणा का पक्ष क्रमशः कम होता गया। यहां मुझे घनानंद की पंक्ति याद रही है- "लोग है लागि कवित्त बनावत/मोहि तो मेरे कवित्त बनावत।" यहां कवित्त के व्यक्तित्व में ढलने की प्रक्रिया संवेदना के व्यक्तित्व रूपहो जाने की है। प्रायः लोगों में रचना और व्यक्तित्व में फांक रह जाती है। यहां यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि रचना-प्रक्रिया के बीच व्यक्तित्व निर्माण की क्या दो प्रक्रियाएं हैं? एक प्रक्रिया घनानंद की है, जो संवेदनशीलता से रचना तक जाती है और दूसरी प्रक्रिया बोध, ज्ञान, शास्त्र, सामजिक आकांक्षा से रचना की ओर जाने की। शंकराचार्य, तुलसी, प्रसाद या अन्य रचनाकार बोध के स्तर से रचना की ओर जाते है...ये अपने बोध को रचना में ढालते हैं...और दूसरे प्रकार का रचनाकार अपनी संवेदना को रचना में। इन दो प्रक्रियाओं के स्तर पर क्या रचनाकार व्यक्तित्व के गठन की प्रक्रिया में अंतर पड़ जाता है? संवेदनशीलता को रचना में ढालने का प्रयास तीव्रता...भावुकता की मांग करता है। ऐसा व्यक्तित्व बुद्धि की अपेक्षा हृदय के आवेगों को महत्व देता है, जबकि बोधयुक्त रचनाकार हृदय की अपेक्षा बुद्धिको। इस स्तर पर घनानंद और राजेश जोशी की बात कहीं मिलती दिखती है। 'कवि-व्यक्तित्व' इस ढंग से और क्या समझा जाए कि यह "घोर असामाजिक समाज में संवेदना-केंद्र का प्रवक्ता" या "संवेदना को रचनात्मक बनाने वाला व्यक्तित्व" है।