मंगलवार, 4 जून 2013

मौलिकता का रहस्य

मौलिक होने का सर्वप्रथम अर्थ तो यह है-अपने मूल की ओंर बढ़ने का सृजनात्मक प्रयास .द्वितीय रूप में मौलिक होने का अर्थ मानवीय अनुभूतियों-प्रेरणाओं-संवेदनाओं का पुनर्सृजन है.और सबसे महत्वपूर्ण रूप में मौलिक होने का अर्थ मनुष्यता-समाज-परिवेश-प्रकृति के लिए नयी संभावनाओं के द्वार खोलना है.

बुधवार, 29 मई 2013

प्रतिभा का स्रोत

प्रतिभा जन्मजात होकर भी सामजिक गति से अछूती नहीं है .प्रतिभाशाली अपने युग -परिवेश -ज्ञान -ऊर्जा का निचोड़ एवं संभावना होता है .प्रतिभाशाली समस्त युग की सृजनात्मकता का संयोजक एवं आविष्कारक होता है .अतः कोई भी समाज हो वह बिना प्रतिभाशाली के गतिशील नहीं होता है .

बुधवार, 22 मई 2013

सृजन का रहस्य

जीवन को रहस्य के रूप में नहीं आनंद के रूप में देखने का प्रयास करें .जीवन की गति सृजन और संघर्ष से आती है.

सूत्र-वाक्य

समय से पूर्व किया गया श्रम उसी प्रकार ब्यर्थ हो जाता है जिस प्रकार जिस प्रकार मौसम से पूर्व डाला गया बीज

शुक्रवार, 17 मई 2013

नकली भाव का सत्य

उत्तर-औधोगिक समाज में लगता है सब कुछ बाई -प्रोडक्ट हो गया है -हमारे नायक ,हमारे सम्बन्ध ,हमारे भाव ,हमारी क्रियाएं ,हमारा अद्दययन ,हमारा लेखन यानी सब कुछ .वस्तुवों  में मिलावट जब तक होती रही तब तक तो हमारा शारीर ही प्रभावित हुआ था ,लेकिन जब भावों में मिलावट होने लगी तब हमारी पूरी सामाजिक संरचना ही ध्वस्त होने के कगार पर पहुँच गई .कारण यह कि हमारे सम्पूर्ण कार्य -ब्यापार ,भाव के उत्त्पन होने ,उनमें रमने और उनसे उत्त्पन आनंद ,पर ही टिके होते है .ऐसी  स्थिति में यदि मूल में ही गड़बड़ी आ जाए तो समाज कैसे स्वस्थ रह सकता है .भाव व्यक्तिगत नहीं सामाजिक क्रिया है .दो व्यक्तियों       की अनुभूति ,संवेदना ,  इच्छा,विचार ,मानसिक परिवेश एवम सृजन की आकांक्षा का जब योग होता है तब भाव उत्त्पन होता है .आज कल मानसिक परिवेश ,विचार .इच्छा  के प्रभाव से अनुभूति ,संवेदना का आभास दिखाकर भाव या सम्बन्ध निर्मित हो रहे है .पहले संबंधों में भाव मुख्य होता था ,उसका स्थान आज बुद्धि -लब्धि ने ले लिया है .बुद्धि के सहारे संबंधों को जीने वाला वंचक हो सकता है .भाव को धारण करने वाला          व्यक्तित्व नहीं .उत्तर-आधुनिकता में जब भाषा भी खेल है तब सम्बन्ध भी खेल हो जाये तब आश्चर्य ही क्या .ऐसी  स्थिति में व्यक्तित्त्वहीन व्यक्तित्त्व  एवं नपुंसक समाज निर्मित हो रहा है तो वह भी सभ्यता के विनाश के क्रम में ही है .

गुरुवार, 16 मई 2013

कबीरदास .................

आज मैंने अपना ब्लॉग बनाया और सब से पहले कबीर को याद किया .


साधो ये मुरदों का गांव, पीर मरे पैगम्बर मरिहैं
मरि हैं जिन्दा जोगी, राजा मरिहैं परजा मरिहै
मरिहैं बैद और रोगी, चंदा मरिहै सूरज मरिहै
मरिहैं धरणि आकासा, चौदां भुवन के चौधरी मरिहैं
इन्हूं की का आसा, नौहूं मरिहैं दसहूं मरिहैं
मरि हैं सहज अठ्ठासी, तैंतीस कोट देवता मरि हैं
बड़ी काल की बाजी, नाम अनाम अनंत रहत है
दूजा तत्व न होइ, कहत कबीर सुनो भाई साधो
भटक मरो ना कोई