रचना प्रक्रिया और रचना शैली : कुछ स्फुट बातें
आज एक प्रिय मित्र से रचना प्रक्रिया और रचना शैली पर बातचीत हुई। मित्र ने रचना प्रक्रिया को वस्तुनिष्ठ और रचना शैली को आत्मनिष्ठ कहा। रचना प्रक्रिया को प्रायः लोग आत्मनिष्ठ समझते हैं। वे कहते हैं कि प्रत्येक लेखक की रचना प्रक्रिया अलग होती है या अलग हो सकती है। क्या वाकई ऐसा है? मुक्तिबोध ने कविता की रचना प्रक्रिया को तीन क्षणों में विभक्त किया। स्वयं मुझे यह प्रक्रिया चार चरणों में दिखी। किन्तु क्या हर रचनाकार के लिए अलग रचना प्रक्रिया है? किसी कथ्य के रचना में ढलने की प्रक्रिया क्या लेखक के अधीन है? प्रथमतः हमें लगता है कि रचना प्रक्रिया लेखकीय व्यक्तित्व के अधीन है, किन्तु ऐसा होता नहीं। रचना का निर्माण कथ्यगत होता है, व्यक्तित्वगत नहीं। एक कथ्य ही अनेकों प्रक्रियाओं से होते हुए रचना/कला में ढल जाता है। अतः उसमें वस्तुनिष्ठता होती है। प्रश्न है कि फिर रचनाकार के व्यक्तित्व की इसमें क्या भूमिका होती है? एक रचनाकार का व्यक्तित्व रचना के भीतर उसकी वैचारिकी में इस प्रकार अंतर्भुक्त होता है कि वह रचना को विशिष्ट तो बनाता है, किन्तु उसकी प्रक्रिया तो वस्तुनिष्ठ ढंग से ही चला करती है। रचना प्रक्रिया का संबंध कथ्य की माप व उसके विभिन्न पड़ाव हैं। मसलन ग्रामीण पृष्ठभूमि पर या मानवीय संबंधों पर प्रेमचंद और प्रसाद दोनों एक कहानी लिखते हैं। प्रश्न है कि कहानी में पार्थक्य के बिंदु कहाँ होते हैं? दोनों कहानियों पर दोनों रचनाकारों के व्यक्तित्व का प्रभाव तो दिखेगा, उनकी शैली अलग होगी, किन्तु क्या रचना प्रक्रिया के स्तर पर कहानी रचना के पड़ाव भी भिन्न बनेंगे? कुछ रचनाकार इस प्रक्रिया को आत्मनिष्ठ रूप में देखने का प्रस्ताव रचते हैं, रचना प्रक्रिया को अमूर्त समझते हैं; किन्तु यह दृष्टि रचनाकार व्यक्तित्व को कथ्य और रचना प्रक्रिया से ज्यादा महत्व देने के क्रम में गतिशील होती है। हां यह हो सकता है कि किसी रचना के बनने की प्रक्रिया में असंबद्धता हो, क्रम उलट-पुलट से लगें; किन्तु क्या रचना के रचाव क्षण में भी यह बेतरतीबी बरक़रार रहती है? दरअसल जब हम ऐसे असंबद्ध दृश्यों की बात करते हैं, तब हम असंबद्ध अनुभवों की बात कर रहे होते हैं। लेकिन जब हम रचना क्षणों में होते हैं, तब हमारे अनुभव एक बिंदु पर अपने को सघन करते हैं। रचना प्रक्रिया में हमारे अनुभव और कथ्य एक द्वंद्वात्मक योग रचते हैं। हमारा अनुभव रचना प्रक्रिया को वैयक्तिक रूप देता है, किन्तु कथ्य उसे वस्तुनिष्ठ रूप देता है। कथ्य वैयक्तिक होते हुए भी अपनी प्रक्रिया में वस्तुनिष्ठ होकर ही सार्थक हो पाता है। वस्तुनिष्ठता वस्तुतः या मुख्यतः क्रिया के स्तर पर घटित होती है। किन्तु प्रभाव में केवल आत्मनिष्ठता हो, यह आवश्यक नहीं। नहीं तो हर रचना का आस्वादन पाठक अपने ढंग से ग्रहण करता। हां यह होता है कि एक पाठक किसी रचना में अपनी दृष्टि आरोपित कर देता है, किन्तु उसके आस्वादन की प्रक्रिया पूर्णतः स्वायत नहीं। रस वस्तुनिष्ठ है। आस्वाद के स्तर पर व्यक्ति/भोक्ता के भीतर वह प्रकट होता है। वस्तुनिष्ठ चीजें ही एक समान ढंग से अपने को प्रकट करती हैं। ऊपर हमने लेखकीय शैली को आत्मनिष्ठ कहा। एक लेखक के अनुभवबोध और व्यक्तित्व के प्रक्षेप को हम शैली में ढलते देखते हैं। रचनाकार के व्यक्तित्व को जब रचना प्रक्रिया की वस्तुनिष्ठता अपनी यांत्रिकता में नहीं ढाल पाती, तब रचना शैली का प्रश्न उठ खड़ा होता है। रचना शैली लेखक का व्यक्तित्व अर्जन है। रचना प्रक्रिया कथ्य की क्रियात्मक अभिव्यक्ति है। इस ढंग से कथ्य और व्यक्तित्व की भंगिमाएं ही रचना में वस्तुनिष्ठ और आत्मनिष्ठ रूप धारण कर लेती हैं।
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