उत्तर-औधोगिक समाज में लगता है सब कुछ बाई -प्रोडक्ट हो गया है -हमारे नायक ,हमारे सम्बन्ध ,हमारे भाव ,हमारी क्रियाएं ,हमारा अद्दययन ,हमारा लेखन यानी सब कुछ .वस्तुवों में मिलावट जब तक होती रही तब तक तो हमारा शारीर ही प्रभावित हुआ था ,लेकिन जब भावों में मिलावट होने लगी तब हमारी पूरी सामाजिक संरचना ही ध्वस्त होने के कगार पर पहुँच गई .कारण यह कि हमारे सम्पूर्ण कार्य -ब्यापार ,भाव के उत्त्पन होने ,उनमें रमने और उनसे उत्त्पन आनंद ,पर ही टिके होते है .ऐसी स्थिति में यदि मूल में ही गड़बड़ी आ जाए तो समाज कैसे स्वस्थ रह सकता है .भाव व्यक्तिगत नहीं सामाजिक क्रिया है .दो व्यक्तियों की अनुभूति ,संवेदना , इच्छा,विचार ,मानसिक परिवेश एवम सृजन की आकांक्षा का जब योग होता है तब भाव उत्त्पन होता है .आज कल मानसिक परिवेश ,विचार .इच्छा के प्रभाव से अनुभूति ,संवेदना का आभास दिखाकर भाव या सम्बन्ध निर्मित हो रहे है .पहले संबंधों में भाव मुख्य होता था ,उसका स्थान आज बुद्धि -लब्धि ने ले लिया है .बुद्धि के सहारे संबंधों को जीने वाला वंचक हो सकता है .भाव को धारण करने वाला व्यक्तित्व नहीं .उत्तर-आधुनिकता में जब भाषा भी खेल है तब सम्बन्ध भी खेल हो जाये तब आश्चर्य ही क्या .ऐसी स्थिति में व्यक्तित्त्वहीन व्यक्तित्त्व एवं नपुंसक समाज निर्मित हो रहा है तो वह भी सभ्यता के विनाश के क्रम में ही है .
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें